चेतावनी! खेतों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक बन सकते हैं इंसानी सेहत के लिए बड़ा खतरा
अच्छी सेहत और तंदुरुस्ती बनाए रखने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ हमेशा से ही सभी लोगों को अपने आहार में नियमित रूप से ताजे मौसमी फल-सब्जियों और पोषक तत्वों से भरपूर चीजों को शामिल करने की सलाह देते आए हैं। फल और सब्जियों के माध्यम से हमारे शरीर को जरूरी विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स प्राप्त होते हैं, जो कई प्रकार की क्रॉनिक (दीर्घकालिक) बीमारियों से बचाव में मददगार साबित होते हैं। लेकिन आज के समय में सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि क्या हमारी थाली में रोज परोसी जाने वाली ये सब्जियां और फल वास्तव में पूरी तरह सुरक्षित हैं? क्या इनसे हमारे शरीर को फायदा पहुँच रहा है या फिर यह हमारी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं?
यह चिंताजनक सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं क्योंकि हाल ही में सामने आए कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि खेतों में फसलों को कीड़े-मकोड़ों से बचाने के लिए धड़ल्ले से इस्तेमाल किए जाने वाले कीटनाशक (पेस्टिसाइड्स) असल में आम इंसानी सेहत के लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। इसी से जुड़ी एक हालिया रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ये खतरनाक कीटनाशक सीधे तौर पर इंसानों के दिमाग और नसों (नर्वस सिस्टम) को भारी नुकसान पहुँचा रहे हैं। इसके कारण दुनिया भर में एक बेहद खतरनाक तंत्रिका संबंधी बीमारी, जिसे 'एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस' (ALS) कहा जाता है, उसका जोखिम तेजी से बढ़ता जा रहा है।
क्या है एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS)?
एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस तंत्रिका तंत्र (नर्वस सिस्टम) से जुड़ी एक बेहद गंभीर और लाइलाज बीमारी है। यह मुख्य रूप से मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी (स्पाइनल कॉर्ड) की उन विशेष तंत्रिका कोशिकाओं यानी मोटर न्यूरॉन्स को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है, जो हमारे शरीर की सभी मांसपेशियों (मसल्स) को नियंत्रित करती हैं। समय बीतने के साथ यह बीमारी लगातार गंभीर होती जाती है, जिसके कारण मरीज के लिए चलना-फिरना, बोलना, कुछ भी खाना और यहाँ तक कि सामान्य रूप से साँस लेना भी बेहद कठिन हो जाता है।
कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल— सेहत के लिए एक बड़ा खतरा
इस नए अध्ययन की सबसे अहम और डरावनी बात यह सामने आई है कि जो लोग अपने कामकाजी जीवन या पेशे के दौरान लंबे समय तक इन कीटनाशकों के सीधे संपर्क में रहते हैं, उनमें एएलएस (ALS) जैसी भयानक बीमारी विकसित होने का खतरा आम लोगों की तुलना में कई गुना अधिक हो सकता है। विशेष रूप से किसान, खेतों में कीटनाशक दवाएँ छिड़कने वाले मजदूर और कृषि एवं बागवानी के क्षेत्र से जुड़े अन्य लोगों को इन गंभीर जोखिमों के प्रति सबसे ज्यादा सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।
वैज्ञानिक विशेषज्ञों की टीम ने बताया कि फल, सब्जियों और अन्य खाद्यान्न फसलों पर धड़ल्ले से छिड़के जाने वाले कीटनाशकों के संपर्क में आने से मोटर न्यूरॉन डिजीज यानी एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस का खतरा 70 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
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इस खतरनाक समस्या का असर इतना गंभीर हो सकता है कि मरीज की मांसपेशियाँ तेजी से कमजोर होने लगती हैं।
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वक्त बीतने के साथ-साथ मरीज को चलने-फिरने तथा स्पष्ट रूप से बोलने में भारी कठिनाई आने लगती है, और कई बार उसकी सोचने-समझने की शक्ति तथा व्यवहार में भी असामान्य बदलाव देखने को मिलते हैं।
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धीरे-धीरे मरीज अपनी रोजमर्रा की सामान्य शारीरिक गतिविधियों और आदतों पर से अपना नियंत्रण खोने लगता है।
कितनी खतरनाक है एएलएस (ALS) की बीमारी?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार इस बात को लेकर चिंता जताते रहे हैं कि एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस से पीड़ित होने वाले मरीजों में से बमुश्किल 20 प्रतिशत लोग ही बीमारी की चपेट में आने के बाद पाँच साल या उससे अधिक समय तक जीवित रह पाते हैं। कई मामलों में तो मरीजों का जीवनकाल बीमारी का पता चलने के बाद केवल दो साल तक का ही सिमटकर रह जाता है।
हालाँकि वैज्ञानिक अभी तक इस गंभीर बीमारी के होने की किसी एक सटीक और सौ प्रतिशत मुख्य वजह का पता नहीं लगा पाए हैं। फिर भी, कनाडा के क्यूबेक स्थित 'रॉबर्ट सॉवे इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च' के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण खुलासा किया है।
शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में किए गए लगभग 800 अलग-अलग अध्ययनों की गहन समीक्षा की। इनमें एएलएस या अन्य प्रकार की गंभीर मोटर न्यूरॉन बीमारियों से जुड़े 2,000 से अधिक मरीजों के मेडिकल आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया गया। इस व्यापक विश्लेषण में यह चौकाने वाला तथ्य सामने आया कि जिन लोगों का अपने कार्यस्थल पर कीटनाशकों के साथ नियमित रूप से संपर्क रहा था, उनमें एएलएस होने का खतरा सामान्य स्वस्थ लोगों की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत अधिक पाया गया।
गौर करने वाली बात यह है कि यह पहला मौका नहीं है जब वैज्ञानिकों ने कृषि में इस्तेमाल होने वाले इन जहरीले कीटनाशकों के कारण पैदा होने वाले खतरों को लेकर दुनिया को आगाह किया है। इससे पहले ब्रिटेन में 'क्लोरपाइरीफॉस' (Chlorpyrifos) नामक एक प्रमुख कीटनाशक पर वर्ष 2016 में ही पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। उस समय कई अध्ययनों में इस बात के पुख्ता प्रमाण मिले थे कि यह रसायन गर्भ में पल रहे शिशु और छोटे बच्चों के मस्तिष्क के सामान्य विकास को भारी क्षति पहुँचा सकता है। इसी प्रकार, 'पैराक्वाट' (Paraquat) नामक खरपतवारनाशक (weedkiller) पर भी दुनिया के कई देशों में रोक लगाई जा चुकी है, क्योंकि इसके इस्तेमाल से पार्किंसन रोग (Parkinson's disease) के मामलों में तेजी से वृद्धि होने की आशंका जताई गई थी।
विशेषज्ञों की क्या है राय?
इंग्लैंड स्थित शेफील्ड विश्वविद्यालय के 'स्कूल ऑफ मेडिसिन एंड पॉपुलेशन हेल्थ' में क्लिनिकल लेक्चरर डॉ. जोनाथन कूपर-नॉक का कहना है कि इस हालिया अध्ययन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें 11 अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों और 2,000 से अधिक मोटर न्यूरॉन डिजीज के मरीजों के आंकड़ों को शामिल किया गया है, इसलिए इसके निष्कर्ष बेहद महत्वपूर्ण और विचारणीय हैं।
हालाँकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह मुख्य रूप से पुराने आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन है, जिसमें सीधे तौर पर कीटनाशकों के संपर्क (Exposure) का प्रत्यक्ष रूप से वैज्ञानिक मापन नहीं किया गया है। इसलिए इस बात का सौ फीसदी दावा नहीं किया जा सकता कि इस बीमारी का इकलौता कारण केवल कीटनाशक ही हैं, या फिर इसके पीछे कोई अन्य पर्यावरणीय या आनुवंशिक कारक भी जिम्मेदार हो सकते हैं।
इसके बावजूद, यह संपूर्ण मानवता के लिए गहरी चिंता का विषय है कि पूरी दुनिया में कृषि और फसलों के नाम पर कीटनाशकों का बेलगाम इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है, और हम अनजाने में ही इसके गंभीर दुष्प्रभावों की चपेट में आते जा रहे हैं।

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